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कैसे जाने कि, नवजात में पीलिया के लक्षण

शिशु के पैदा होने के बाद कुछ दिनों तक उसे रोगों का खतरा ज्यादा रहता है। नवजात बच्चों में पीलिया के मामले बहुत ज्यादा देखने को मिलते हैं। पीलिया के कारण शिशु की त्वचा पीली पड़ने लगती है। शिशुओं को पीलिया, युवाओं से अधिक गंभीर होता है, इसलिए उन्हें पीलिया से बचाने के लिए खास ख्‍याल रखने की आवश्‍यकता होती है। दरअसल पीलिया का कारण शरीर में बिलिरुबिन की मात्रा का बढ़ जाना है। ये बिलिरूबिन एक तरह का पीला पदार्थ है, जो रेड ब्लड सेल्स के टूटने से बनता है। छोटे शिशुओं का लिवर धीरे-धीरे विकसित होता है, जिस कारण ये बिलरूबिन को प्रॉसेस नहीं कर पाता है और शिशु को पीलिया हो जाता है।

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क्या है वो नैचुरल थेरेपी

हाल में हुए एक शोध में ये बताया गया कि शिशुओं और छोटे बच्चों में पीलिया होने पर अगर उन्हें इलाज के साथ-साथ अगर रोज थोड़े समय धूप में रखा जाए, तो वो जल्दी और आसानी से ठीक हो सकते हैं। धूप में विटामिन डी होता है। धूप में रहने के कारण शिशु के शरीर में मौजूद बिलिरुबिन टूट जाते हैं और यूरिन के रास्ते से बाहर निकल जाते हैं। इसलिए नवजात शिशुओं को हर समय कमरे के अंदर रखने के बजाय थोड़ा समय धूप में लेकर भी बैठें। आमतौर पर जन्म के 10-15 दिन बाद लिवर अच्छी तरह विकसित हो जाता है और अपना कार्य करने लगता है।

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अच्छी रोशनी वाली कमरे में शिशु की छाती को हल्के से दबाएं। दबाव हटाते समय अगर शिशु की त्वचा में पीलापन लगे, तो अपने डॉक्टर से बात करें। साफ रंगत वाले शिशुओं पर यह तकनीक बेहतर परिणाम देती है। अन्य शिशुओं में पीलिया की जांच के लिए देखें कि उनकी आंखों के सफेद हिस्से, नाखूनों, हथेलियों या मसूढ़ों में पीलापन तो नहीं है।

शिशु में पीलिया की शुरूआत उसके सिर से होती है। सबसे पहले शिशु का चेहरा पीला पड़ जाता है। उसके बाद यह सीने और पेट में भी फैल जाता है और सबसे अंत में यह पैरों में फैलता है। शिशु की आंखे भी पीली हो जाती हैं। पीलिया के लक्षण शिशु में जितनी देरी से पता चलेंगे खतरा उतना ज्यादा बढ़ेगा। शिशु में अगर पीलिया 14 दिन से ज्यादा रहता हैं तो उसके परिणाम घातक हो सकते हैं। समय पर शिशु में पीलिया की जांच न हो पाने पर बच्चा मानसिक रूप से बीमार हो सकता है। शिशु में अगर पीलिया के लक्षण दिखें तो चिकित्स‍क से तुरंत संपर्क करना चाहिए।

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